
मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि “अवैधता स्वाभाविक रूप से लाइलाज है” और कानून सभी पर बिना अपवाद समान रूप से लागू होता है। अदालत ने पुणे के भीलारेवाड़ी स्थित आर्यन वर्ल्ड स्कूल द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें स्कूल ने पुणे मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (PMRDA) द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें स्कूल के अनधिकृत निर्माण को ध्वस्त करने का निर्देश दिया गया था।
2,000 छात्रों का तर्क भी अदालत को नहीं माना
स्कूल प्रबंधन की ओर से यह दलील दी गई थी कि यह एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्था है जिसमें 2000 छात्र पढ़ते हैं, इसलिए उनके भवन को नियमित किया जाना चाहिए। लेकिन हाईकोर्ट की खंडपीठ — न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खता — ने इसे खारिज करते हुए कहा कि “इस तरह की गलत सहानुभूति न केवल कानून की पवित्रता को कमजोर करती है, बल्कि शहर की योजना को भी खतरे में डालती है।”
ग्रामपंचायत की एनओसी अमान्य
स्कूल की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि 2007 में ग्रामपंचायत से अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) प्राप्त किया गया था, जिस पर निर्माण किया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि ग्रामपंचायत को ऐसा प्रमाणपत्र जारी करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं था, और यदि कोई सक्षम प्राधिकरण मौजूद नहीं था तो स्कूल को कलेक्टर से अनुमति लेनी चाहिए थी।
सरकार को सख्त निर्देश
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह ऐसे अवैध प्रमाणपत्र जारी करने और अनधिकृत निर्माण की अनुमति देने वाले ग्रामपंचायत पदाधिकारियों, विशेष रूप से संबंधित सरपंच के खिलाफ कार्रवाई करे। साथ ही, सरकार से 14 नवंबर 2025 तक एक अनुपालन हलफनामा दाखिल करने को कहा गया है, जिसमें बताए जाए कि किन अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई।
पीठ ने कहा, “महाराष्ट्र में यह एक आम प्रवृत्ति बन गई है कि लोग बिना किसी वैध अनुमति के अवैध निर्माण कर लेते हैं और फिर न्यायालय से सहानुभूति और नियमितीकरण की मांग करते हैं। लेकिन कानून की नजर में यह स्वीकार्य नहीं है।” अदालत ने इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए कड़ा संदेश दिया कि कानून की अनुपालना में किसी प्रकार की ढील नहीं दी जाएगी। चाहे वह संस्था शैक्षणिक हो या कोई अन्य। इस फैसले के माध्यम से हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अवैध निर्माण को किसी भी आधार पर वैध नहीं ठहराया जा सकता और अवैध संरचनाएं नियोजन सिद्धांतों और सार्वजनिक हित के खिलाफ हैं। अदालत की टिप्पणी ने न केवल शहरी नियोजन के महत्व को रेखांकित किया है, बल्कि शासन और प्रशासन से भी पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग की है।



